ज़िन्दगी के ताने-बाने से,
हर अपने और बेग़ाने से,
सारे झूठे अफ़साने से,
नित खिलने और मुरझाने से,
मुझे आज़ाद करो…

अब कोई सोच-विचार नहीं,
कोई सपनों का संसार नहीं,
पल-पल बदलते ज़माने से,
हर तिलिस्मी ख़ज़ाने से,
मुझे आज़ाद करो…

क्यों हर पल तुझको तरसूं मैं,
क्यों इस बेबसी में तड़पुं मैं,
अब वेदना सारे हार चले,
नैनों के अश्रुधार कहे,
मुझे आज़ाद करो…

कितना कुछ भर रखा है,
आत्मा जड़ कर रखा है,
अब ज्ञान और बुद्धिमत्ता से,
रौब-रुत्बा, झूठी सत्ता से,
मुझे आज़ाद करो…

भर सकूँ आकंठ तेरा अमृत,
हो पोर-पोर फिर से झंकृत,
हो नए प्राण का भान मुझे,
प्रभु-भक्ति का फिर गान बजे,
मुझे आज़ाद करो…

– श्वेता सिंह
(१०/०९/१६)

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