“मैं बस एक शरीर नहीं….”

मेरे अंगों को तुम यूँ सरेआम मत झांको,
मेरी चुप्पी से तुम मेरी औक़ात मत आंको,
मिटा कर खाक कर दूंगी तेरे झूठे गुरूर को,
झुकी आँखों से तुम मेरे जज़्बात मत नापो,

मैं म्यान में रखी एक ख़ामोश तलवार हूँ,
मैं बस एक शरीर नहीं, जीवन-आधार हूँ…..

ये दुनियां जन्म लेती है, जो ख़ुद को चीरती हूँ मैं,
कली से फ़ूल खिलती है, लहू से सींचती हूँ मैं,
मेरे गर्भ से ही चहुँ ओर दिव्य प्रकाश बिखरा है,
फ़ूलों में रंग भरती हूँ, जो ख़ुद को बींधती हूँ मैं,

मैं रजस, तमस और सत्व का एकाकार हूँ,
मैं बस एक शरीर नहीं, जीवन-आधार हूँ…..

खामोश जान कर मुझको तुम, मेरी लाचारी बतलाओ मत,
पल-पल परिहास बना कर तुम, मेरी कमजोरी छलकाओ मत,
खामोश वो बहता पानी हूँ, जो चूर-चूर पत्थर कर दे,
नाज़ुक मेरी इस काया पर, तुम अपना दांव दिखाओ मत,

मैं हर उस घुटते मौन की हुंकार हूँ,
मैं बस एक शरीर नहीं, जीवन-आधार हूँ…..

मैं ही शिव की शक्ति हूँ, मैं मूलाधार में बसती हूँ,
तू झाँक जरा खुद के भीतर, मैं ही तेरी ये हस्ती हूँ,
तेरी क्षुधा भी हूँ, तेरी निंद्रा भी, तेरा कण-कण मुझसे प्राणमय है,
जरा देख गौर से तू मुझको, मैं ही पल-पल सब रचती हूँ,

मैं ही सृष्टि में गुंजायमान वो ओंकार हूँ,
मैं बस एक शरीर नहीं, जीवन-आधार हूँ…..

– श्वेता सिंह
(०९/०३/१७)

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