मुझे “मैं” बनकर ही रहना है…”

मैं अविरल नदी की धारा हूँ,
मत रोक मुझे चट्टानों से;
उस नील गगन की पंछी हूँ,
ना छलनी कर तीर-कमानों से;

अब कोई घाव ना सहना है,
मुझे “मैं” बनकर ही रहना है…..

ना मैं सीता, ना मैं गंगा,
ना द्रौपदी की लुटती चीर हूँ मैं,
विध्वंश करे जो दानव का,
उस दुर्गा की तस्वीर हूँ मैं;

अस्तित्व की रक्षा करना है,
मुझे “मैं” बनकर ही रहना है…..

नई बात कहूँ, नए राह चुनूँ,
ना मानूँ विधि-विधानों को,
जहाँ नारी का सम्मान ना हो,
रहने दो वेद-पुराणों को;

अब खुद से नहीं बिछड़ना है,
मुझे “मैं” बनकर ही रहना है…..

झूठी परम्पराओं की, जंजीर में मुझको मत बांधो,
दोहरा चरित्र छुपाने को, मुझे मंदिर-मंदिर मत साधो;
मैं भी तुम जैसी मानव हूँ, मुझे मानव बन कर जीने दो,
अपनी विद्वता दिखाने को, तुम ज्ञान की पोथी मत बांचो;

हाँ, मुझको बस ये कहना है,
मुझे “मैं” बनकर ही रहना है…..

– श्वेता सिंह
(२८/०१/१७)

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