“अंतस की नवरात्री”

आज फिर..
मेरे ज़िस्म में हरारत सी हुई है,
सोये रूह में फिर एक,
हसरत सी हुई है,
सूखे, मुरझाये, मरुस्थल से,
मानस-पटल पर,
आज अमृत की एक बूँद गिरी है…

फिर एक नवजीवन का एहसास,
नयी भावनाओं का संचार,
बंद होती पलकों में,
एक बार फिर से,
बिजली सी वही कौंध है…
धमनियों में नव-ऊर्जा,
रक्त बन कर बह रही है..

मेरे अंतस में नकारात्मकता की,
होली जल रही है..
धू-धू कर होम हो रहा,
सबकुछ…
जैसे नवरात्री में माँ दुर्गा,
अपने सकारात्मक,
तेजोमय प्रकाश से,
सारी बुरी शक्तियों का
नाश कर देती है…
नवरात्रि के मंगल हवन में,
जैसे सारी बुराइयां होम हो जाती हैं,
आज मेरे अंतःकरण में,
वही दुर्गोत्सव हो रहा है…

और “नवरात्री” के इस नए चक्र में,
“माँ दुर्गा” ने,
मुझे मेरे खोये हुए अस्तित्व से,
आज फिर मिलाया है…
फिर वही “स्व” की “खुशबू”,
मेरे अंतस को आह्लादित कर रही है…

“अवचेतना” से “चेतना” की ओर,
“सुसुप्तावस्था” से “जागृति” की ओर,
“मृतप्राय” से “पुनर्जन्म” की ओर,
आज फिर कदम बढ़ाया है मैंने,
“अंतस के अमावस” से,
“अंतस की नवरात्रि” की ओर…

– श्वेता सिंह
(०७/१०/१६)

 

PC – Google

SHARE
Previous article“मुझे आज़ाद करो…”
Next article“Grant Me Freedom…!”
Hi. This is Shweta Singh. I have completed my M.Sc. in Biotechnology from Banasthali Vidyapeeth, Jaipur. Then, completed Post Graduate Diploma in Bioinformatics from IBAB, Bangalore. I was working as a Bioinformatician in Bangalore itself. Currently, I am in Mumbai and working as a writer.

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY