“कि वक़्त बहुत कम है..”

भर जाने दो क़तरा-क़तरा ज़ख्मों के उन पलों को,
सिल जाने दो लम्हा-लम्हा अब उन सारे ग़मों को,
जिश्मों के एक-एक पोर को आज़ाद होने दो,
अपनी घुटी हर चीख़ को अब हुंकार होने दो,
कि वक़्त बहुत कम है…

झांकों खुद के भीतर, एक नयी दुनियां है वहां,
छोड़ो इस तिलिस्म को, कि इसने लूटा है जहाँ,
यूँ वक़्त ज़ाया ना करो, बस बेकार की रश्मों में,
अब तो जी लो कुछ पल, तुम अपने हसीन सपनों में,
कि वक़्त बहुत कम है…

झूठी शान में डूबकर, खुद की पहचान मत खोना,
दुनियां की आपा-धापी में, तुम और भ्रमित मत होना,
इससे पहले कि तेरी पहचान हो जाए तार-तार,
अपनी आत्मा की पुकार तुम सुन तो लो एक बार,
कि वक़्त बहुत कम है…

इस मानव-जीवन को, तुम यूँ ही मत ठुकराओ,
ये ईश्वर का आशीर्वाद है, इसे ऐसे मत उलझाओ,
क्यों बर्बाद करते हो इस जीवन को बेवजह,
अब तो समझ जाओ अपने जीने कि हर वजह,
कि वक़्त बहुत कम है…

– श्वेता सिंह
(१७/०८/१६)

 

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Hi. This is Shweta Singh. I have completed my M.Sc. in Biotechnology from Banasthali Vidyapeeth, Jaipur. Then, completed Post Graduate Diploma in Bioinformatics from IBAB, Bangalore. I was working as a Bioinformatician in Bangalore itself. Currently, I am in Mumbai and working as a writer.

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