कुछ धब्बों में सनी थी,
एक सीलन सी पड़ी थी,
ज़रा आग में तपाया,
उसे सोने सा चमकाया,
मुक़म्मल सा फ़िर बनाया,
एक टुकड़ा ख़्वाब का…

चुपचाप सी थी सहमी,
आवाज़ में थी नरमी,
फ़िर नींद से जगाया,
खुल के उसे हंसाया,
फ़िर फ़ूल सा महकाया,
एक टुकड़ा ख़्वाब का…

गर्द के जमे परत को,
एक फूँक से उड़ाया,
नामोनिशाँ को मैंने,
मिटने से फ़िर बचाया,
फ़िर एक बार संजोया,
एक टुकड़ा ख़्वाब का…

ज़िम्मेदारियों के बोझ से,
यूँ ही दबा पड़ा था,
सब रिश्ते आगे निकले,
वो ख़ामोश सा खड़ा था,
फ़िर हाथ उसका थामा,
मैंने अपना उसको माना,
फ़िर ख़्वाब से मिलाया,
एक टुकड़ा ख़्वाब का…

– श्वेता सिंह
(२६/०८/१६)

 

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Hi. This is Shweta Singh. I have completed my M.Sc. in Biotechnology from Banasthali Vidyapeeth, Jaipur. Then, completed Post Graduate Diploma in Bioinformatics from IBAB, Bangalore. I was working as a Bioinformatician in Bangalore itself. Currently, I am in Mumbai and working as a writer.

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