“आज फ़िर…”

आज फ़िर किसी ने एक टूटते शय को, जांबाज़ बनाया होगा,
एक बुझती हुई चिंगारी को फ़िर आग बनाया होगा,
संभाला होगा उस रूह को अपनी जान से बढ़कर,
आज फ़िर किसी ने डूबती कश्ती को, तूफ़ां से निकाला होगा..
आज फ़िर….

लाख़ों सितारे बिख़रे होंगे उस चाँद के गुलिस्तां में,
आज फ़िर कुछ ने टूट कर उसके जन्नत को संवारा होगा,
उस प्यासी सी धरती को, अपनी चांदनी से नहाया होगा…
आज फ़िर किसी अँधेरे घर को, अपनी रौशनी से सजाया होगा,
आज फ़िर…..

टूटती उम्मीदों को, उम्मीद का दामन पकड़ाया होगा,
पथराई सी आँखों में, फ़िर सपनों का समंदर लहराया होगा,
ज़िन्दगी की जंग में हारे हुए सिपाही को,
आज फ़िर किसी ने सिकंदर बनाया होगा,
आज फ़िर…..

– श्वेता सिंह
(२८/१२/१६)

 

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